नफ़रत है मुझे

By Dr.Abhay Kumar

काले लिबास को ओढे,
झूठी शान-शौकत,
रखने वालों से,
नफ़रत है मुझे.

मुँह में राम,साथ में गोली,
शांति का चोला पहनकर ,
खेलता वो,रक्त की होली ,
इनसे,नफ़रत है मुझे .

दिल में,द्वेष का विष दबाये,
झूठी हंसी, हंसने वालों से,
जो उनकी तारीफ़ करते हैं.
इनसे,नफ़रत है मुझे .

ज़नाजे पर जाकर ,
आँख नम करने वाले,
बस चंद, सिक्कों की खातिर,
लोगों से ,नफ़रत है मुझे .

अपने चूल्हे में आग नहीं,
दूसरों के घरों में ,
आग लगाने वालों से,
नफ़रत है मुझे .

घर में दो सूखी रोटी नहीं नहीं ,
बच्चे भूख से बिलख ,
शराब में धुत्त बाप से ,
नफ़रत है मुझे .

प्यार की आड़ में ,
ख्वाबी संगमर्मर के ताजमहल ,
बनाने वालों से,
नफ़रत है मुझे .

जल रहा आज इंशान,
नफ़रत की आग में,
ऐसे विषैले नफ़रत से,
हाँ ,नफ़रत है मुझे .

One Response to “नफ़रत है मुझे”

  1. mithilesh aditya Says:

    good

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